आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक परिचय (Hazari Prasad Dwivedi Ka Jeevan Parichay in Hindi )
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हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियां
हिंदी के श्रेष्ठ निबंधकार, उपन्यासकार, आलोचक एवं भारतीय संस्कृति के युगीन व्याख्याता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म वर्ष 1960 में बलिया जिले के दुबे का छपरा नामक ग्राम में हुआ था। संस्कृत एवं ज्योतिष का ज्ञान इन्हें उत्तराधिकारी में अपने पिता पंडित अनमोल दुबे से प्राप्त हुआ। वर्ष 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त करने के बाद वर्ष 1940 से 1950 तक ये शांति निकेतन में हिंदी भवन के निदेशक के रूप में रहे। विस्तृत स्वाध्याय एवं साहित्य सृजन का शिलान्यास यही हुआ। वर्ष 1950 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। वर्ष 1960 से वर्ष 1966 तक पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। वर्ष 1957 में इन्हें पदम भूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया। अनेक गुरुत्तर दायित्वों को निभाते हुए उन्होंने वर्ष 1979 में रोग शय्या पर ही चिरनिद्रा ली।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक सेवाएं –
आधुनिक युग के गद्य कारों में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का महत्वपूर्ण स्थान है। हिंदी गद्य के क्षेत्र में इनकी साहित्यिक सेवाओं का अवकलन निम्नलिखित किया जा सकता है।
1. निबंधकार के रूप में - आचार्य द्विवेदी के निबंधों में जहां साहित्य और संस्कृति की अखंड धारा प्रवाहित होती है, वही प्रतिदिन के जीवन की विविध गतिविधियों, क्रिया व्यापारों, अनुभूतियों आदि का चित्रण भी अत्यंत सजीव सा और मार्मिकता के साथ हुआ है।
2. आलोचक के रूप में – आलोचनात्मक साहित्य के सृजन की दृष्टि से द्विवेदी जी का महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी आलोचनात्मक कृतियों में विद्वता और अध्ययन शीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ‘सूर साहित्य' उनकी प्रारंभिक आलोचनात्मक कृति है।
3. उपन्यासकार के रूप में – द्विवेदी जी ने चार महत्वपूर्ण उपन्यासों की रचना की है। ये हैं – बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्र लेख, पुनर्नवा और ‘अनामदास का पोथा’। संस्कृति पृष्ठभूमि पर आधारित ये उपन्यास द्विवेदी जी की गंभीर विचार शक्ति के प्रमाण हैं।
4. हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध रूप में — द्विवेदी जी ने ललित निबंध के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण लेखन कार्य किए हैं। हिंदी के ललित निबंध को व्यवस्थित रुप प्रदान करने वाले निबंधकार के रूप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अग्रणी हैं। निश्चय ही ललित निबंध के क्षेत्र में वे युग प्रवर्तक लेखक रहे हैं।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की रचनाएं ( कृतियां )
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनको निम्नलिखित वर्गों में प्रस्तुत किया गया है।
1. निबंध संग्रह — अशोक के फूल, कुटज, विचार प्रवाह, विचार और वितर्क, आलोचक पर्व, कल्पलता।
2. आलोचना साहित्य — सूर साहित्य, कालिदास की लालित्य योजना, कबीर साहित्य सहचर, साहित्यिक का मर्म।
3. इतिहास — हिंदी साहित्य भूमिका, हिंदी साहित्य का आदिकाल, हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास।
4. उपन्यास — बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्र लेख पुनर्नवा, अनामदास का पोथा।
5. संपादन — नाथ सिद्धों की बानियां, संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, संदेश रासक।
6. अनूदित रचनाएं - प्रबंध चिंतामणि, पुरातन प्रबंध संग्रह, प्रबंध कोश, विश्व परिचय, लाल कनेर, मेरा बचपन आदि।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की भाषा शैली -
द्विवेदी जी ने अपने साहित्य में संस्कृतनिष्ठ, साहित्यिक तथा सरल भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने संस्कृत के साथ - साथ अंग्रेजी, उर्दू तथा फारसी भाषा के प्रचलित शब्दों का प्रयोग भी किया है।
इनकी भाषा में मुहावरों का प्रयोग प्रायः कम हुआ है। इस प्रकार द्विवेदी जी की भाषा शुद्ध, परिष्कृत एवं परिमार्जित खड़ी बोली है। उनकी गद्य शैली प्रौढ़ एवं गंभीर हैं। इन्होंने विवेचनात्मक, गवेषणात्मक, आलोचनात्मक, भावात्मक तथा आत्मपरक शैलियों का प्रयोग अपने साहित्य में किया है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्य में स्थान -
डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी की कृतियां हिंदी साहित्य की शाशवत निधि हैं। उनके निबंधों एवं आलोचनाओं में उच्च कोटि की विचारात्मक क्षमता के दर्शन होते हैं। हिंदी साहित्य जगत में उन्हें एक विद्वान समालोचक, निबंधकार एवं आत्मकथा लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त है। वस्तुतः वे एक महान साहित्यकार थे। आधुनिक युग के गद्दकारों में उनका विशिष्ट स्थान है।

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